History Of Rajasthan In Hindi || राजपूत संबंध

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History Of Rajasthan In Hindi
History Of Rajasthan

History Of Rajasthan In Hindi

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History Of Rajasthan

राजपूत संबंध (राजस्थान का इतिहास)

मुगल – राजपूत संबंध 

  • चित्तौड़ विजय के बाद अकबर ने चित्तौड़गढ़ का नाम मुहम्मदाबाद/मुस्तफा बाद रखा।
  • महाराणा उदयसिंह की अपनी रानी धीरबाई भटीयानी के प्रभाव में आकर अपने अयोग्य पुत्र जगमाल को उत्तराधिकार घोषित किया।
  • लेकिन समांन्तों ने उदयसिंह की मृत्यु के बाद गोगुन्दा में महाराणा प्रताप का राज्याभिषेक किया। ।
  • उदयसिंह की रानी धीरबाई भटीयानी का पुत्र जगमाल व सज्जाबाई का पुत्र शक्तिसिंह अकबर की सेना में सम्मिलित हो गये।

महाराणा प्रताप

  • महाराणा प्रताप का जन्म 9 मई 1540 के दिन कुम्भलगढ़ किले के बादल महल में हुआ।
  • जैवन्ता बाई पाली के अखैराज सोनगरा की पुत्री थी।
  • महाराणा प्रताप उदयसिंह की पटरानी जैवन्ता बाई का पुत्र था।
  • महाराणा प्रताप ने अपने नाना अखैराज सोनगरा की सहायता से जगमाल को गद्दी से हटा कर मेवाड़ अपने अधिकार में लिया।
  • प्रांरभ में महाराणा प्रताप का राजतिलक गोगुन्दा में हुआ। लेकिन विधिवत् राज्याभिषेक कुभलगढ़ में हुआ।
  • महाराणा प्रताप की कमर में शाही तलवार पंडित कृष्णदास ने बांधी।

 महाराणा प्रताप  व अकबर 

  • अकबर ने महाराणा प्रताप को समझाने के लिए 4 शिष्ट मंडल भेजे, और चारों मंडल महाराणा प्रताप को अकबर की अधीनता स्वीकार करवाने में असफल रहें।

अकबर द्वारा भेजे गये शिष्ट मंडल

  1. जलाल खां -1572
  2. मानसिंह -1573
  3. भगवन्त दास -1573
  4. टोडरमल -1573
  • चारों मंडलो के असफल रहने पर अकबर अजमेर आया तथा अजमेर स्थित अकबर के किले में युद्ध लड़कर महाराणा प्रताप को बन्दी बनाने की योजना बनाई।
  • मेवाड़ पर आक्रमण करने के लिए अकबर ने आमेर के मानसिंह कछवाह तथा आसफ खां को सेनापति बनाया।
  •  21 जून 1576 के दिन मेवाड़ की सेना व मुगल सेना के बीच हल्दीघाटी का युद्ध हुआ।
  •  हल्दीघाटी का युद्ध मैदान राजसमन्द जिले में है।
  •  यहीं से बनास नदी उद्गम होता है।
  •  हल्दीघाटी युद्ध मैदान को खमनौर की पहाड़ी /गोगुन्दा की पहाड़ी व रक्त तलाई के नाम से भी जाना जाता है।
  •  इस युद्ध में महाराणा प्रताप के सेनापति हकीम खां सूर व झाला बीदा थे।
  • इस युद्ध में महाराण प्रताप ने अपने घोड़े चेतक को मानसिंह के हाथी पर चढ़ा दिया और भाले से प्रहार किया।
  •  प्रताप द्वारा किये गये प्रहार से बचने के लिए मानसिंह हाथी के ओहदे में छुप गया। लेकिन वार से मानसिंह के हाथी का महावत मारा गया। और उसकी एक टाँग जख्मी हो गई।
  •  महाराणा प्रताप को मुगल सेना से घिरे देखकर झाला मान ने महाराणा प्रताप का मुकुट व राजचिन्ह धारण किया।
  • झाला मान को महाराणा प्रताप सझमकर मुगल सेना उस पर टूट पड़ी और महाराणा प्रताप युद्ध भूमि से बाहर निकल गया।
  •  महाराणा प्रताप का पिछा करते मुगल सैनिकों को प्रताप के छोटे भाई शक्तिसिंह ने मौत घाट उतार दिया।
  •  बनास नदी पार करते ही चेतक दम तोड़ दिया, तब शक्तिसिंह ने अपना घोड़ा त्राटक महाराणा प्रताप को दिया जिसे लेकर महाराणा प्रताप पहाड़ी में चले गये।
  •  प्रताप व शक्तिसिंह के इस घटनाक्रम की जानकारी अमर काव्य वंशावली व राज प्रशस्ती से मिलती है।
  •  हल्दीघाटी का सजीव वर्णन – मुन्तकाफ उल तवारीख में अब्बदुल कादीर बदॉयूनी।
  •  बदॉयूनी ने हल्दीघाटी के युद्ध को गोगुन्दा का युद्ध कहा है।

  •  अकबर के दरबार में बदॉयूनी अकबर का घोर विरोधी इतिहासकार था।
  •  अबुल फजल ने हल्दीघाटी के युद्ध को अपने ग्रन्थ आईने अकबरी/अकबरनामा में खमनौर का युद्ध कहा है।
  •  हल्दीघाटी के युद्ध को कर्नल जैम्स टौड ने मेवाड़ की थर्मोपल्ली कहा है।
  •  हल्दीघाटी का युद्ध अनिर्णायक रहा (गोपीनाथ शर्मा के अनुसार)
  • इस युद्ध में मिहत्तर खां ने मुगल सेना में जोश पैदा करने के लिए अफवाह फैलाई की अकबर आ गया।
  •  हल्दीघाटी के बाद अकबर मानसिंह से नाराज हो गया तथा मनसबदारी छीन ली व दरबार से 6 माह के लिए निकाल दिया।
  •  हल्दी घाटी मे महाराणा प्रताप का सहयोग ग्वालियर के शासक रामसिंह, व बेटे शालीवान, झाला मानसिंह, सोनगरा मानसिंह व ताराचन्द ने दिया।
  • इस युद्ध में असफ खां ने जीहाद का नारा दिया।
  • हल्दीघाटी में महाराणा प्रताप के हाथी का नाम रामप्रसाद था, जिसको मुगल सेना ने पकड़कर नाम बदलकर पीर प्रसाद कर दिया।
  •  हल्दीघाटी में मानसिंह के हाथियों के नाम- मर्दाना व हवाई थे।
  • भामाशाह को मेवाड़ का रक्षक या उद्वारक कहा जाता है।
  •  हल्दीघाटी के अन्य हाथियों के नाम – गजराज, लूणा ,सोनू थे।
  •  हल्दीघाटी में महाराणा प्रताप के भील सेनापति का नाम – पूंजा सोलंकी था।
  • प्रताप ने सेना का पुर्नगठन किया।
  • हल्दीघाटी में मुगल सेना 80,000 तथा प्रताप की सेना 20,000 थी- वीर विनोद के अनुसार ।
  •  हल्दीघाटी के बाद प्रताप ने कोलीयारी गाँव (उदयपुर) होते हुए कुंभलगढ़ में शरण ली।
  •  प्रताप ने हल्दीघाटी युद्ध के बाद चावन्ड(उदयपुर) को अपनी राजधानी बनाया।
  • हल्दीघाटी के बाद प्रताप ने छापामार/गुरिल्ला युद्ध पद्धति अपनाई
  • हल्दीघाटी के बाद प्रताप की आर्थिक स्थिति खराब हो गई। तब उसकी आर्थिक मदद पाली निवासी भामाशाह ने की।

दिवेर का युद्ध 1582

  • दिवेर के युद्ध में प्रताप का सेनापति अमरसिंह प्रथम था।
  • अकबर ने आक्रमण करने के लिए सुल्तान खां के सेनापतित्व में सेना भेजी।
  • दिवेर के युद्ध में महाराणा प्रताप की विजय हुई व अकबर पराजित हुआ।
  • दिवेर के युद्ध को कर्नल जैम्स टोड ने मेवाड़ मेराथन कहा है।
  • प्रताप के विरूद्ध अकबर ने शाहबाज खां को तीन बार भेजा और वे तीनों बार असफल रहा।
  • प्रताप के विरूद्ध अकबर ने अंतिम बार जगन्नाथ कछवाह को भेजा वह भी असफल रहा।
  • 19 जनवरी 1597 को राजधानी चावड़ में महाराणा प्रताप का देहान्त हुआ।
  • चेतक का चबूतरा (समाधि) बलीचा गाँव हल्दीघाटी राजसमन्द में है।

महाराणा अमर सिंह प्रथम (1597 – 1620)

  • 1605 में अकबर की मृत्यु होने के बाद उसका पुत्र सलीम जहाँगीर के नाम से मुगल बादशाह बना।
  • जहाँगीर ने मेवाड़ के प्रति आक्रामक नीति अपनाई।
  • जहाँगीर ने अपने पुत्र खुर्रम (शाहजहाँ) को मेवाड़ पर आक्रमण करने के भेजा और आदेश दिया कि खड़ी फसलों को जला दो। कत्ले – आम करो।
  • अमर सिंह प्रथम को उसके पुत्र कर्ण सिंह व सामन्तों ने समझाया। तब उसने शाहजहाँ से संधि कर ली।
  • इस संधि को मुगल – मेवाड़ संधि (1615) के नाम से जाना जाता है। राजकुमार कर्ण सिंह व शाहजादा खुर्रम मेवाड़ में पगड़ी बदल कर धर्म भाई बने।
  • जहाँगीर के दरबार में प्रथम मेवाड़ी राजकुमार कर्ण सिंह गया था। जिसे जहाँगीर ने मनसबदारी प्रदान की।
  • कर्ण सिंह के बेटे जगत सिंह प्रथम ने पिछौला झील में जग मंदिर महल बनवाया।
  • 1615 के बाद चावण्ड़ के स्थान पर फिर से चित्तौड़गढ़ को राजधानी बनाया गया।

महाराणा राजसिंह (1652 – 1680)

  • उपाधि – विजय कद काटू
  • राजसिंह ने राजसमंद झील का निर्माण करवाया।
  • राजसमंद झील के उत्तरी किनारे को नौ चोटी की पाल कहते हैं।
  • इस झील के किनारे राजप्रशस्ति नामक संस्कृत ग्रंथ को 25 शिलालेखों के रूप में उत्कीर्ण किया गया है।
  • राजप्रशस्ति एशिया की सबसे बड़ी प्रशस्ति है जिसमें मेवाड़ का इतिहास लिखा है।
  • राजसिंह के समकालीन दिल्ली का बादशाह औरंगजेब था जिससे महाराणा राजसिंह की अनबन थी।

औरंगजेब से राजसिंह की अनबन के कारण 

  • औरंगजेब के विद्रोही दुर्गादास को राजसिंह ने शरण दी।
  • किशनगढ़/रुपनगढ़ की राजकुमारी चारुमति।
  • औरंगजेब ने जजिया कर लगाया, राजसिंह ने विरोध किया।
  • औरंगजेब ने मंदिर तोड़ने के आदेश दिए, राजसिंह ने बनवाये।

राजसिंह द्वारा बनवाए गए मंदिर

  • अम्बा माता मंदिर – उदयपुर
  •  द्वारिकाधीश जी मंदिर – कांकरोली (राजसमंद)
  • श्रीनाथ जी मंदिर – नाथद्वारा (राजसमंद)

 

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